: कोचिंग सिटी के तौर पर पहचान रखने वाले कोटा शहर में लगातार स्टूडेंट्स की संख्या कम हो रही है। कहा जा रहा है कि कोटा का माहौल फीका हो रहा है। बताया जाता है कि कोटा के लिए आखिरी सुनहरा दौर 2022-23 था, जो अब खत्म होने लगा है । 2022-23 में 2,25,000 से अधिक संख्या थी। छात्रों की संख्या 2023-24 में घटकर 1,75,000 और मार्च 2025 तक 1,22,000 हो गई है। यहां स्टूडेंट्स के सुसाइड केस ने बड़ा झटका दिया है, जिससे देश की कोचिंग राजधानी बनने का शहर का सपना टूट गया है। इसके साथ ही, इसका पूरा पारिस्थितिकी तंत्र भी ध्वस्त हो गया है। पीजी आवास प्रदान करने वाले छात्रावास, छात्रों और उनके परिवारों को भोजन उपलब्ध कराने वाले मेस संचालक, और कई सहायक सेवाएं ठप्प सी होने लगी है।
यह माने जा रहे हैं कारण
कोटा कोचिंग में कोविड काल को भी महत्वपूर्ण माना जाता है। कोविड के बाद से यहां आने वाले छात्रों की कमी अहम मानी जी रही है। इसके अलावा सबसे बड़ा कारण स्टूडेंट्स के हर साल होने वाले सुसाइड केस भी है। कोविड के बाद ऑनलाइन क्लासेज के ट्रेंड ने भी यहां आने वाले स्टूडेंट्स की संख्या को कम किया है। कोटा के बड़े सेंटर्स का दूसरे शहरों में सेंटर्स खोले जाना भी एक बड़ा कारण बना है।कोटा में रौनक ऐसे हो रही कम
भारत की कोचिंग राजधानी ने पिछले कुछ वर्षों में अपनी रौनक खो दी है। कोचिंग सेंटर की यूनिफॉर्म पहने छात्रों से भरी गलियां कम होने लगी है। यहां बर्गर, वड़े और ऑमलेट परोसने वाले खचाखच भरे रेस्टोरेंट, और राजीव गांधी नगर तथा लैंडमार्क सिटी जैसे प्रतिष्ठित इलाकों में पेइंग गेस्ट (पीजी) आवासों पर लगे 'नो वेकेंसी' के बोर्ड अब गायब हो गए हैं। छात्रों के नामांकन में कमी आई है, साथ ही कोचिंग संस्थानों का रेवेन्यू भी कम हुआ है, जिससे कई कोचिंग संस्थानों को अपने कम वेतन वाले सेंटर बंद करने या दूसरे शहरों में नए सेंटर खोलने पर मजबूर होना पड़ा है।सरकार का एक्शन भी क्या लाएगा भूचाल
गौरतलब है कि 17 जून का सरकारी आदेश इस उद्योग के ताबूत में आखिरी कील साबित हो सकता है। यहां इसमें भारत की शिक्षा प्रणाली में उन कमियों की पहचान करने के लिए एक समीक्षा समिति का गठन करने का आह्वान किया गया है जो छात्रों को कोचिंग सेंटरों पर निर्भर रहने के लिए मजबूर करती हैं, जिससे आलोचनात्मक सोच के बजाय रटने की संस्कृति को बल मिलता है। समिति कोचिंग सेंटरों द्वारा किए गए गलत विज्ञापन दावों और छात्रों को 'डमी स्कूलों' में दाखिला देने की अनैतिक प्रथा की भी जांच करेगी, जो छात्रों की उपस्थिति को कम करके आंकते हैं ताकि वे केवल कोचिंग पर ध्यान केंद्रित कर सकें। कोटा, जो कभी इस मॉडल का आदर्श था, अब एक चेतावनी बन सकता है।कोटा के लिए ऐसे लाइफलाइन बनी थी कोचिंग हब
कोटा, जिसके पास पड़ोसी बूंदी में एक किला, कोटा स्टोन और साड़ी के अलावा कुछ भी खास नहीं है, हमेशा के जयपुर, जोधपुर, जैसलमेर और उदयपुर जैसे प्रतिष्ठित शहरों से कमतर रहा है। 'राजस्थान का कानपुर' कहे जाने वाले इस शहर में बिजली, इंजीनियरिंग, रसायन और उर्वरक कंपनियां स्थित थीं । यहां श्रमिकों की संख्या, अशांति तथा हिंसक सड़क अपराधों का बोलबाला था। 1980 और 90 के दशक में जब इस शहर की औद्योगिक स्थिति क्षीण होने लगी, तो कोचिंग इस शहर के लिए जीवनरेखा बन गई थी।माना जाता है कि इसकी नींव वी.के. बंसल ने रखी। दरअसल, वे जेके सिंथेटिक्स में काम करने वाले एक मैकेनिकल इंजीनियर थे। वे अपनी कंपनी के बंद होने के साथ-साथ एक स्वास्थ्य संकट मस्कुलर डिस्ट्रॉफी का निदान से भी जूझ रहे थे। कोचिंग के छात्रों ने उन्हें एक वैकल्पिक आजीविका की ओर अग्रसर किया और जल्द ही, उनके छात्रों ने आईआईटी-जेईई परीक्षा पास करना शुरू कर दिया। यहीं से यहां कोचिंग क्लासेस की शुरुआत हुई, जो देशभर में इंजीनियरिंग छात्रों के लिए मिसाल और ठिकाना बन गया।from https://ift.tt/Xft98uD
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